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Thursday, February 12, 2026
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गाजीपुर: धनुष यज्ञ सीता स्वयंवर श्री राम विवाह का मंचन हुआ संपन्न

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गाजीपुर। अति प्राचीन श्री रामलीला कमेटी हरिशंकरी के तत्वावधान में लीला के तीसरे दिन 19 सितंबर को बंदे वाणी विनायकौ आदर्श रामलीला मंडल के कलाकारों द्वारा बड़े ही सुंदर ढंग से धनुष यज्ञ सीता स्वयंवर परशुराम लक्ष्मण संवाद रावण बाणासुर संवाद तथा श्री राम विवाह प्रसंग का मंचन करके दर्शकों का मन मोह लिया।
लीला के दौरान दर्शाया गया कि एक समय महाराज जनक के दरबार में शिव जी का पुराना धनुष रखा था जो किसी से उठाया नहीं जा सकता था। उस धनुष को सीता जी एक स्थान से दूसरे स्थान पर उठाकर के रख दीं। महाराज जनक को जब पता चला तो उन्होंने कुछ दिन बाद स्वयंवर रचाया जिसमें सभी राज्य के राजाओं को निमंत्रण भेजा गया था इसके साथ ही दूतों द्वारा महामुनि विश्वामित्र को भी निमंत्रण भेजा गया था। निमंत्रण पा करके सभी राजा एकत्रित हो गए साथ ही लंका नरेश रावण तथापाताल लोक के बाणासुर भी स्वयंवर में उपस्थित थे कुछ देर तक रावण और बाणासुर का संवाद चला। निमंत्रण पाकर महामुनि विश्वामित्र अपने दोनों शिष्य श्री राम लक्ष्मण के साथ स्वयंवर में पहुंचते हैं। जब महाराज जनक को दूतों पता चलता कि महर्षि विश्वामित्र स्वयंवर के बाहर खड़े हैं। तो वे अपने गुरु शतानंद जी के साथ अपने आसन से उठकर गेट पर आते है और महामुनि विश्वामित्र जी को आदर के साथ स्वयंवर में ले जाकर उच्चासन पर विराजमान होने का निवेदन करते हैं। महामुनि विश्वामित्र दोनों शिष्यों के साथ आसन पर विराजमान होते हैं।
इधर राजा जनक अपने मंत्री चाणूर को स्वयंवर का कार्य शुरू होने का आदेश देते हैं। मंत्री चाणूर द्वारा सभी उपस्थित राजाओं को संबोधित करते हैं कि जो शिवजी के धनुष को प्रत्यंचा चढ़ा कर तोड़ेगा उसी से राजकुमारी सीता का विवाह होगा। सर्वप्रथम लंका नरेश रावण धनुष तोड़ने के लिए तैयार होते हैं तो उनके मन में विचार आता है कि भगवान शिव हमारे आराध्याय देव हैं अतः वे धनुष को प्रणाम किया और प्रतिज्ञा करते है कि मैं सीता जी को एक बार लंका में लाकर उनका दर्शन करूंगा। इतना कहने के बाद महाराज रावण वहां से चल देते हैं। इसके बाद सभी राजा गण धनुष पर अपने-अपने बल का प्रयोग करना शुरू कर देते हैं। परंतु कोई भी शिवजी के धनुष को तोड़ना तो दूर हिल तक न सका। राजा जनक निराश होकर कहते हैं कि ‌**तजहूं आस निज निज गृह जाहू। लिखा न विधि वैदेहि विवाहु। कहा कि हे राजा गण अगर मैं सोचता कि धरती वीरो से खाली है तो मैं सीता स्वयंवर प्रण नहीं करता। इतना सुनने के बाद लक्ष्मण जी महाराज जनक पर क्रोधित हो जाते है। श्री राम ने लक्ष्मण को बैठने का इशारा कर देते हैं। उधर राजा जनक के निराश चेहरा को देखकर महामुनि विश्वामित्र ने श्री राम को धनुष तोड़ने का इशारा करते हैं गुरु का इशारा पाकर श्री राम अपने गुरु महामुनि विस्वामित्र को मन ही मन प्रणाम करते हैं और धनुष के तरफ आगे बढ़कर सभी देवी देवताओं को नमन करते हुए बड़े सरलता के साथ धनुष को उठा लेते हैं और प्रत्यंचा चढ़ा कर धनुष को तोड़ देते हैं। धनुष टूटने के बाद सीता जी श्री राम के गले में वरमाला डाल देती है सखियां मांगलिक गीत प्रस्तुत करती है। धनुष टूटते ही जय श्री राम हर हर महादेव के नारों से पूरा वातावरण राम में हो गया।
जब परशुराम जी को धनुष टूटने का आवाज सुनाई देता है तो वे क्रोधित होकर स्वयंवर में पहुंचते हैं उनके आते ही सभी उपस्थित राजा उन्हें देखकर थरथर कांपते हैं। और डरते हुए उनके समीप जाकर के सिर झुकाते हुए प्रणाम करते हैं तो सभी राजाओं को परशुराम ने धक्का देकर भगा देते। इसी बीच महाराज जनक द्वारा उनको प्रणाम किया गया उन्होंने महाराज जनक को आशीर्वाद दिया। महाराज जनक ने अपनी पुत्री सीता को बुला करके परशुराम जी को प्रणाम कराया ‌ उन्होंने सीता जी को आशीर्वाद दिया। थोड़ी देर रुकने के बाद जनकजी से
परशुराम जी ने स्वयबर का कारण पूछा । तो महाराज जनक ने सारी बातें बता दी इसके बाद परशुराम जी की दृष्टि टूटे हुए शिव जी के धनुष पर पड़ती है तो वह और क्रोधित होकर के पूछते हैं कि महाराज जनक शिव धनुष को किसने तोड़ा है परशुराम जी के प्रश्न का उत्तर श्री राम ने देते हुए कहा कि शिवजी के धनुष को तोड़ने का साहस हे महामुनी आपका दास ही कर सकता है कहिए दास के लिए क्या आ गया है। परशुराम जी ने कहा कि राम सेवक का काम है सेवा करना लड़ाई करना नहीं है। इसके बाद कुछ देर तक श्री राम से परशुराम का संवाद चला परशुराम के क्रोध को देखते हुए श्री राम के छोटे भाई लक्ष्मण परशुराम के पास आते हैं अतः परशुराम लक्ष्मण संवाद काफी देर तक चला। अंत में परशुराम जी को जब मालूम होता है कि साक्षात् नारायण सामने खड़े हैं फिर भी उन्होंने श्रीराम से कहा कि हे राम ,,, राम रमापति करधन लैहू खैचहु चाप मिटहि संदेहू। श्री राम ने परशुराम जी का आज्ञा पाकर धनुष का प्रत्यंचा चढ़ाते हुए पूछते हैं कि कि है महामुनी इस बाण को किस दिशा में छोडूं। परशुराम जी ने दक्षिण दिशा में बाण छोड़ने का निवेदन करते हैं। और महाराज जनक से परशुराम जी कहते हैं कि महाराज जनक पुत्री सीता का विवाह धूमधाम के साथ होना चाहिए। इतना कहने के बाद वहां से श्री राम को प्रणाम करके तपस्या के लिए चल देते हैं।परशु राम जी के जाने के बाद महाराज जनक अपने गुरु शदानंद के आदेशानुसार दशरथ जी को निमंत्रण भेज कर बारात मंगवाते हैं और विधि विधान के साथ सीताराम का विवाह संपन्न करते हैं। इस दृश्य को देखकर सभी दर्शन भाव विभोर हो गए।
इस मौके पर उपाध्यक्ष गोपाल जी पाण्डेय, मंत्री ओमप्रकाश तिवारी, उप मंत्री लव कुमार त्रिवेदी, मेला प्रबंधक मनोज कुमार तिवारी, उप मेला प्रबंधक मयंक तिवारी, कोषाध्यक्ष बाबू रोहित अग्रवाल, प्रमोद कुमार गुप्ता,पं0 कृष्ण विहारी त्रिवेदी पत्रकार, राम सिंह यादव, राजकुमार शर्मा आदि रहे।

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