स्नातकोत्तर महाविद्यालय, गाजीपुर में पूर्व शोध प्रबंध प्रस्तुत संगोष्ठी का आयोजन किया गया यह संगोष्ठी महाविद्यालय के अनुसंधान एवं विकास प्रकोष्ठ तथा विभागीय शोध समिति के तत्वावधान में महाविद्यालय के सेमिनार हाल में सम्पन्न हुई, जिसमें महाविद्यालय के प्राध्यापक, शोधार्थी व छात्र- छात्राएं उपस्थित रहे। उक्त संगोष्ठी मे संगीत विषय की शोधार्थिनी शैल गुप्ता ने अपने शोध प्रबंध शीर्षक “मूल वाद्य यंत्रों एवं इलेक्ट्रॉनिक वाद्य यंत्रों का विवेचनात्मक अध्ययन” नामक विषय पर शोध प्रबंध व उसकी विषय वस्तु प्रस्तुत करते हुए कहा कि यह विषय केवल संगीत तक सीमित नहीं है, बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत और आधुनिक तकनीकी प्रगति दोनों के समन्वय का प्रतीक है। मूल वाद्य यंत्रो की उत्पत्ति प्राचीन काल में हुई और जो प्राकृतिक पदार्थों जैसे लकड़ी, धातु, एवं चमड़े आदि से निर्मित होते हैं। इन वाद्य यंत्रों में ध्वनि उत्पन्न करने के लिए किसी विद्युत ऊर्जा की आवश्यकता नहीं होती। तबला, सितार, बांसुरी और शहनाई जैसे वाद्य यंत्र न केवल संगीत के साधन हैं, बल्कि हमारी संस्कृति, परम्परा और आध्यात्मिकता के प्रतीक भी हैं। इनकी ध्वनि में एक प्राकृतिक मधुरता और आत्मीयता होती है, जो श्रोता के मन को सीधे स्पर्श करती है। किन्तु, इन वाद्य यंत्रों की कुछ सीमाएँ भी हैं, जैसे ध्वनि की तीव्रता सीमित होना, ट्यूनिंग में कठिनाई, तथा बड़े मंचों पर इनके उपयोग के लिए अतिरिक्त साधनों की आवश्यकता। वहीं वर्तमान युग में तकनीकी विकास के साथ-साथ इलेक्ट्रॉनिक वाद्य यंत्रों का महत्व तेजी से बढ़ा है। ये वाद्य यंत्र विद्युत या डिजिटल तकनीक के माध्यम से ध्वनि उत्पन्न करते हैं। कीबोर्ड, सिंथेसाइज़र, इलेक्ट्रिक गिटार और डिजिटल ड्रम जैसे यंत्रों की विशेषता यह है कि एक ही उपकरण से अनेक प्रकार की ध्वनियाँ उत्पन्न की जा सकती हैं। साथ ही, ध्वनि को नियंत्रित और संशोधित करना भी संभव है। हालांकि, इन वाद्य यंत्रों में प्राकृतिक ध्वनि का अभाव होता है और ये पूरी तरह से बिजली एवं तकनीक पर निर्भर होते हैं। यदि हम दोनों का तुलनात्मक अध्ययन करें, तो पाते हैं कि जहाँ मूल वाद्य यंत्र हमारी सांस्कृतिक पहचान और परंपरा के वाहक हैं, वहीं इलेक्ट्रॉनिक वाद्य यंत्र आधुनिकता और नवाचार के प्रतीक हैं। एक ओर मूल वाद्य यंत्र आत्मा को स्पर्श करते हैं, तो दूसरी ओर इलेक्ट्रॉनिक वाद्य यंत्र संगीत को व्यापक, प्रभावशाली और बहुआयामी बनाते हैं। अंत मे कहा जा सकता है कि संगीत की वास्तविक सुंदरता इन दोनों के संतुलित समन्वय में निहित है। हमें अपनी परंपरा को सहेजते हुए आधुनिक तकनीक को भी अपनाना चाहिए, ताकि संगीत का विकास निरंतर होता रहे। प्रस्तुतिकरण के बाद विभागीय शोध समिति, अनुसंधान एवं विकास प्रकोष्ठ व प्राध्यापकों तथा शोध छात्रों द्वारा शोध पर विभिन्न प्रकार के प्रश्न पूछे गए जिनका शोधार्थिनी शैल गुप्ता ने संतुष्टिपूर्ण एवं उचित उत्तर दिया। तत्पश्चात समिति एवं महाविद्यालय के प्राचार्य प्रोफे०(डॉ०) राघवेन्द्र कुमार पाण्डेय ने शोध प्रबन्ध को विश्वविद्यालय में जमा करने की संस्तुति प्रदान किया। इस संगोष्ठी में महाविद्यालय के प्राचार्य प्रोफे० (डॉ०) राघवेन्द्र कुमार पाण्डेय, अनुसंधान एवं विकास प्रकोष्ठ के संयोजक प्रोफे०(डॉ०) जी0 सिंह, शोध निर्देशक एवं संगीत विभाग की विभागाध्यक्षा प्रोफे० (डॉ०) मीना सिंह, प्रोफे(डॉ०) अरुण कुमार यादव, डॉ० रविशेखर सिंह, डॉ० रामदुलारे, डॉ०अशोक कुमार, डॉ० योगेश कुमार, डॉ०प्रतिमा सिंह, डॉ० सुशील कुमार सिंह, डॉ० शिप्रा श्रीवास्तव, डॉ० गोपाल यादव, प्रोफे० (डॉ०) रविशंकर सिंह, डॉ०लवजी सिंह, डॉ० अनिल पाण्डेय, डॉ०कमलेश, प्रदीप सिंह एवं महाविद्यालय के प्राध्यापकगण तथा शोध छात्र छात्रएं आदि उपस्थित रहे। अंत में डॉ० मीना सिंह ने सभी का आभार प्रकट किया तथा संचालन अनुसंधान एवं विकास प्रोकोष्ठ के संयोजक प्रोफे० (डॉ०) जी० सिंह ने किया।
गाजीपुर: मूल वाद्य यंत्र हमारी सांस्कृतिक पहचान और परम्परा के वाहक हैं, वहीं इलेक्ट्रॉनिक वाद्य यंत्र आधुनिकता और नवाचार के प्रतीक: शैल गुप्त
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